Kaal Sarp Dosh Puja


Kaal Sarp Puja in Trimbakeshwar

Kalsarp Dosh Nivaran is formed when all the planets are situated between Rahu & Ketu. When all the planets are hemmed between Rahu and Ketu i.e., the moon’s north node and the moon’s south node Kalsarp Yog is formed. Complete Kalsarp Yog is formed only when half of the chart is unoccupied by planets.

The Kalsarp Yog is a dreaded yog that can cause one’s life to be miserable. A person under the affliction of this yog leads a life of pain and misfortune. If it is highly afflicted this yog has the capacity to cancel out all the good Yoga’s of the chart.

When all the stars of fortune or planets get trapped in a vicious circle or when all the stars of fortune concentrate at one position in a horoscope then it is termed as conjunction of planets and then it’s time for you to understand that you have kalsarp yog in your life. At times a few planets are outside the circumference or reach of rahu and ketu. We earn lot of money but never know how it is spent or how it goes away from us. This yog brings negative thoughts in our mind and also creates fear in our mind. This yog brings hurdles in our studies and also creates problems in getting married. Kalsarp yog also brings downfalls or loss in business. Conflicts in husband-wife relation and other problems are also due to kalsarp yog.

Benefits of performing Kalsarp Shanti Puja:

By performing Kalsarp Shanti one gets blessed by 9 different species of snakes. Along with Kalsarp Shanti puja, Rahu & Ketu puja opens up the doors of success. By worshiping the gold idol of snake one gets blessed by Goddess Laxmi. The money earned is spent for right purpose. The unknown fear disappears from the mind. The mind is at peace and one starts thinking in a positive way. One gets respect in the society and also brings success in professional life. Family relations grow good and strong. Kalsarp Shanti puja protects a person from evil powers and energies. One gets an opportunity to serve his parents and elderly people in the family. Fear of snake vanishes by worshiping him. One gets rid of evil influence. Good health is achieved by performing Kalsarp Shanti Puja. One attains success in life by this puja.

कालसर्प एक ऐसा योग है जो जातक के पूर्व जन्म के किसी जघन्य अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में परिलक्षित होता है। व्यावहारिक रूप से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता ही है, मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान होती ही नहीं, या होती है तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है। धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। तरह तरह के रोग भी उसे परेशान किये रहते हैं।

  • जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भ्रम की बीमारी सताती रहती हो, या उसे हमेशा लगता है कि कोई उसे नुकसान पहुँचा सकता है या वह व्यक्ति मानसिक तौर पर पीड़ित रहता है।
  • जब लग्न में मेष, वृश्चिक, कर्क या धनु राशि हो और उसमें बृहस्पति व मंगल स्थित हों, राहु की स्थिति पंचम भाव में हो तथा वह मंगल या बुध से युक्त या दृष्ट हो, अथवा राहु पंचम भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक की संतान पर कभी न कभी भारी मुसीबत आती ही है, अथवा जातक किसी बड़े संकट या आपराधिक मामले में फंस जाता है।
  • जब कालसर्प योग में राहु के साथ शुक्र की युति हो तो जातक को संतान संबंधी ग्रह बाधा होती है।
  • जब लग्न व लग्नेश पीड़ित हो, तब भी जातक शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान रहता है।
  • चंद्रमा से द्वितीय व द्वादश भाव में कोई ग्रह न हो। यानी केंद्रुम योग हो और चंद्रमा या लग्न से केंद्र में कोई ग्रह न हो तो जातक को मुख्य रूप से आर्थिक परेशानी होती है।
  • जब राहु के साथ बृहस्पति की युति हो तब जातक को तरह-तरह के अनिष्टों का सामना करना पड़ता है।
  • जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है।
  • जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
  • जब राहु के साथ शनि की युति यानी नंद योग हो तब भी जातक के स्वास्थ्य व संतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी कारोबारी परेशानियाँ बढ़ती हैं।
  • जब राहु की बुध से युति अर्थात जड़त्व योग हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी आर्थिक व सामाजिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
  • जब अष्टम भाव में राहु पर मंगल, शनि या सूर्य की दृष्टि हो तब जातक के विवाह में विघ्न, या देरी होती है।
  • यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में और राहु बारहवें भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक बहुत बड़ा धूर्त व कपटी होता है। इसकी वजह से उसे बहुत बड़ी विपत्ति में भी फंसना पड़ जाता है।
  • जब लग्न में राहु-चंद्र हों तथा पंचम, नवम या द्वादश भाव में मंगल या शनि अवस्थित हों तब जातक की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती। उसे प्रेत-पिशाच बाधा से भी पीड़ित होना पड़ सकता है।
  • जब दशम भाव का नवांशेश मंगल/राहु या शनि से युति करे तब संबंधित जातक को हमेशा अग्नि से भय रहता है और अग्नि से सावधान भी रहना चाहिए।
  • जब दशम भाव का नवांश स्वामी राहु या केतु से युक्त हो तब संबंधित जातक मरणांतक कष्ट पाने की प्रबल आशंका बनी रहती है।
  • जब राहु व मंगल के बीच षडाष्टक संबंध हो तब संबंधित जातक को बहुत कष्ट होता है। वैसी स्थिति में तो कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब राहु मंगल से दृष्ट हो।
  • जब लग्न मेष, वृष या कर्क हो तथा राहु की स्थिति 1ले 3रे 4थे 5वें 6ठे 7वें 8वें 11वें या 12वें भाव में हो। तब उस स्थिति में जातक स्त्री, पुत्र, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य का सुख प्राप्त करता है।
  • जब राहु छठे भाव में अवस्थित हो तथा बृहस्पति केंद्र में हो तब जातक का जीवन खुशहाल व्यतीत होता है।
  • जब राहु व चंद्रमा की युति केंद्र (1ले 4थे 7वें 10वें भाव) या त्रिकोण में हो तब जातक के जीवन में सुख-समृद्धि की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
  • जब शुक्र दूसरे या 12वें भाव में अवस्थित हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
  • जब बुधादित्य योग हो और बुध अस्त न हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
  • जब लग्न व लग्नेश सूर्य व चंद्र कुंडली में बलवान हों साथ ही किसी शुभ भाव में अवस्थित हों और शुभ ग्रहों द्वारा देखे जा रहे हों। तब कालसर्प योग की प्रतिकूलता कम हो जाती है।
  • जब दशम भाव में मंगल बली हो तथा किसी अशुभ भाव से युक्त या दृष्ट न हो। तब संबंधित जातक पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
  • जब शुक्र से मालव्य योग बनता हो, यानी शुक्र अपनी राशि में या उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो और किसी अशुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट न हो रहा हो। तब कालसर्प योग का विपरत असर काफी कम हो जाता है।
  • जब शनि अपनी राशि या अपनी उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो तथा किसी अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों। तब काल सर्प योग का असर काफी कम हो जाता है।
  • जब मंगल की युति चंद्रमा से केंद्र में अपनी राशि या उच्च राशि में हो, अथवा अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हों। तब कालसर्प योग की सारी परेशानियां कम हो जाती हैं।
  • जब राहु अदृश्य भावों में स्थित हो तथा दूसरे ग्रह दृश्य भावों में स्थित हों तब संबंधित जातक का कालसर्प योग समृध्दिदायक होता है।
  • जब राहु छठे भाव में तथा बृहस्पति केंद्र या दशम भाव में अवस्थित हो तब जातक के जीवन में धन-धान्य की जरा भी कमी महसूस नहीं होती।

Muhurats of Kalsarp Puja:

Jan 2020 : 1, 3, 5, 7, 9, 11, 12, 14, 16, 18, 19, 21, 23, 26, 28 and 30

Feb 2020 : 1, 3, 5, 7, 10, 12, 14, 17, 19, 21, 23, 24, 26 and 28

Mar 2020 : 1, 3, 5, 7, 8, 10, 12, 15, 16, 17, 19, 21 and 23

Apr 2020 : 1 , 2 , 4 , 5 , 6 , 8 , 10 , 11 , 12 , 14 , 18 , 19 , 20 , 22 , 25 , 26 , 28 and 30

May 2020 : 1 , 3 , 5 , 7 , 9 , 10 , 11 , 14 , 16 , 17 , 18 , 20 , 22 , 24 , 25 , 27 , 29 , 30 and 31

Jun 2020 : 3 , 5 , 7 , 10 , 13 , 14 , 15 , 18 , 20 , 21 , 23 , 25 , 27 , 28 and 30

July 2020 : 1 , 3 , 5 , 7 , 10 , 12 , 13 , 16 , 18 , 19 , 20 , 22 , 25 , 26 , 27 , 29 and 31

Aug 2020 : 1 , 2 , 3 , 5 , 7 , 8 , 9 , 12 , 15 , 16 , 18 , 19 , 21 , 22 , 23 , 26 and 29

Sep 2020 : 1 , 3 , 6 , 7 , 10 , 12 , 13 , 15 , 17 , 19 , 20 , 21 , 24 , 26 , 27 and 29

Oct 2020 : 2 , 4 , 7 , 10 , 11 , 12 , 14 , 16 , 18 , 20 , 23 , 24 , 25 , 28 and 30

Nov 2020 : 1 , 5 , 7 , 8 , 9 , 12 , 14 , 15 , 16 , 19 , 21 , 22 , 25 , 27 , 29 and 30

Dec 2020 : 2 , 5 , 6 , 8 , 10 , 12 , 13 , 14 , 17 , 19 , 20 , 22 , 25 , 26 , 27 , 29 and 31

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